Tuesday, December 9, 2008

इन्तिज़ार में

इन्तिज़ार में

हाय हाय,
हाय हाय हाय |
हो रहा है घोर अन्याय |
जाना है मुझे घर
मगर
कम्भक्त दिन बीत ही नहीं रे |

यह जो मेरी घड़ी है, सुस्ता गई है |
कल तक जो
घड़ी घड़ी , मेरी यह घड़ी , घड़ी बदल रही थी
आज येही घड़ी मेरी, घड़ी घड़ी वहीँ पे खड़ी है |
और ऐसे मटक मटक के आराम से सुई हिला रही है
जैसे हो कोई शादी की घोडी |
अरे, नाचूं क्या तेरे चलने के लिए |

और इसका जो रखवाला है
वकत
जो कल तक रफ़्तार से भाग रहा था
न जाने आज कौन से कछुए से दोस्ती कर बैठा है |
कुछ तो मेरी कदर कर,
आज तो ज़रा तेज़ चल ,
जल्दी से पहुँचा दे मेरे घर |
मिनट के रेट पे नहीं पर
कम से कम
तारिख आज घंटे के रेट पे तो आगे कर



अरे तलाश है मुझको उस इंसान की
जो कुछ बरस पहले हर रविवार को
सवेरे सवेरे
"मैं समय हूँ" "मैं समय हूँ"
कह कर के अपना परिचय देता था
नाम के साथ पता भी तो देना था
बेसब्री से ढूंढ रहा हूँ तुझे
थोड़ा दौड़ ले आज,
काहे इस सुहावने मौसम में घर के अन्दर सो रहा है


और अब कहाँ चला गया है वो
जो हर जगह है पर फिर भी नहीं है
जो हर समय है पर फिर भी नहीं है
आज आठ तारिख हो गई है
मेरे को पन्द्रह पे पहुँचा दे
तेरी मोजज़ा के जो चर्चे हैं
उसमें एक और बढ़ा दे



मेरी यह खुद्कर्ज़ ज़िन्दगी
जिसके पास कल तक मेरे लिए ही
तिनके भर का टाइम नहीं था
आज वोही देखो,
कैसे मुँह लटकाए मेरे बगल में बैठी है
जैसे किसी छोटे बच्चे का खिलौना छीन लिया गया हो उससे
और मुझसे कविता लिखने पे मजबूर कर रही है
चंचल दिमाग आख़िर करे भी तो क्या करे |

2 comments:

Gursharan Singh said...

Sweet.

meri tanhai aur yeh ghadi,
kya saazish ghad rahin hai

ghar jaane ke intezaar mein
ya main ya to yeh, koi to adrust hai

aman said...

bahut mast!!
'are naachoon kya tere saamne' to bahut hi mast tareeke se kaha hai ..

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